ईरान-इस्राइल युद्ध के बीच शांति की पहल: ईरानी विदेश मंत्री और पाकिस्तानी मंत्री मोहसिन नकवी की अहम मुलाकात

ईरान और पाकिस्तान के मंत्रियों की अहम मुलाकात

ईरान और इस्राइल के बीच इस समय दोनों तरफ से घातक हमले हो रहे हैं। इस भयानक सैन्य संघर्ष को शांत करने के लिए ही ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी से मुलाकात की है। दोनों देशों के बीच यह एक उच्च स्तरीय बैठक थी। इस बैठक में दोनों नेताओं ने मुख्य रूप से सुरक्षा और युद्ध को फैलने से रोकने पर बात की।

मध्य-पूर्व यानी पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच कूटनीतिक मोर्चे पर शांति की एक नई और अहम पहल सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और पाकिस्तान के गृह व संघीय मंत्री मोहसिन नकवी ने आपस में एक लंबी और बेहद महत्वपूर्ण बातचीत की है। यह खबर इसलिए बहुत जरूरी है क्योंकि अगर ईरान और इस्राइल का यह युद्ध और भड़का, तो इसके शोले अरब देशों से निकलकर हमारे दक्षिण एशिया तक भी पहुंच जाएंगे। इस बैठक का मुख्य मकसद इसी बढ़ते महायुद्ध के खतरे को रोकना और इलाके में शांति बनाए रखना है।

ईरान और इस्राइल के बीच इस समय दोनों तरफ से घातक हमले हो रहे हैं। इस भयानक सैन्य संघर्ष को शांत करने के लिए ही ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी से मुलाकात की है। दोनों देशों के बीच यह एक उच्च स्तरीय बैठक थी। इस बैठक में दोनों नेताओं ने मुख्य रूप से सुरक्षा और युद्ध को फैलने से रोकने पर बात की।

पाकिस्तानी और ईरानी नेताओं ने इस बात पर खास चर्चा की कि इस्लामिक सहयोग संगठन को कैसे एकजुट किया जाए। वे चाहते हैं कि सभी बड़े मुस्लिम देश मिलकर एक साथ आएं। इसके जरिए गाजा, लेबनान और ईरान पर हो रहे लगातार हमलों को रुकवाने के लिए पूरी दुनिया पर एक कड़ा दबाव बनाया जा सकता है। इसके अलावा, दोनों नेताओं ने सीमा पर आतंकवाद रोकने और मानव तस्करी पर लगाम लगाने जैसे मुद्दों पर भी सहमति जताई।

इस अचानक हुई मुलाकात के पीछे दोनों देशों की अपनी-अपनी गहरी चिंताएं हैं। ईरान इस समय चारों तरफ से अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों और इस्राइल के हमलों से घिरा हुआ है। ऐसे मुश्किल समय में ईरान को अपने पड़ोसी देशों के मजबूत साथ की बहुत जरूरत है। ईरान चाहता है कि युद्ध के दौरान उसकी पूर्वी सीमा यानी पाकिस्तान से सटी सीमा पूरी तरह सुरक्षित रहे।

दूसरी तरफ पाकिस्तान के अपने हित भी इस बैठक से जुड़े हैं। पाकिस्तान इस समय एक बहुत ही भीषण आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। पाकिस्तान को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना की सख्त जरूरत है। यह पाइपलाइन लंबे समय से अमेरिका के डर से अटकी पड़ी है। इसके अलावा मोहसिन नकवी ने सीमा पर सक्रिय उग्रवादी गुटों के खिलाफ खुफिया जानकारी साझा करने पर भी जोर दिया, ताकि दोनों देशों की सुरक्षा मजबूत हो सके।

ईरान और पाकिस्तान के आपसी रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं। दोनों के रिश्तों में कई बार भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इसी साल जनवरी के महीने में दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव इतना बढ़ गया था कि दोनों ने एक-दूसरे के इलाके में उग्रवादियों के ठिकानों पर मिसाइलें दाग दी थीं। उस घटना से दोनों देशों के रिश्ते काफी कड़वे हो गए थे।

लेकिन अब ईरान और इस्राइल युद्ध के कारण हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। ईरान पर अब एक बड़ा बाहरी खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में ईरान रणनीतिक रूप से पाकिस्तान के साथ अपने संबंध सुधारना चाहता है। पाकिस्तान दुनिया का अकेला ऐसा मुस्लिम देश है जिसके पास परमाणु हथियार हैं। पाकिस्तान के साथ दोस्ती बढ़ाकर ईरान अमेरिका और इस्राइल को यह संदेश देना चाहता है कि वह इस लड़ाई में बिल्कुल भी अकेला नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही इन बैठकों का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ता है। अगर ईरान और इस्राइल के बीच यह युद्ध और भड़कता है, तो आम जनता की मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आएगा। तेल महंगा होने से पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे।

जब ईंधन महंगा होता है, तो माल की ढुलाई का खर्च भी बढ़ जाता है। इससे खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा की हर जरूरी चीज आम आदमी की पहुंच से दूर होने लगेगी। इसके अलावा हमारे इलाके के लाखों लोग अरब देशों में काम करते हैं। युद्ध की स्थिति में उनकी नौकरियां और उनकी जान दोनों खतरे में पड़ सकती हैं। इसलिए इस शांति वार्ता के सफल होने से आम लोगों को महंगाई और बेरोजगारी के खतरे से काफी राहत मिल सकती है।

यह शांति की राह इतनी भी आसान नहीं है। पाकिस्तान के लिए ईरान के साथ बहुत आगे तक जाना काफी मुश्किल है। इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका का भारी दबाव है। अमेरिका पाकिस्तान का एक बड़ा व्यापारिक साथी है। पाकिस्तान को अपनी डूबती अर्थव्यवस्था बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज चाहिए होता है, जिसमें अमेरिका की रजामंदी बहुत जरूरी होती है।

इसके अलावा पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ भी बेहद गहरे रिश्ते हैं। हालांकि अब सऊदी अरब और ईरान के संबंध पहले से कुछ सुधरे हैं, लेकिन युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान के लिए इन सभी देशों के बीच संतुलन बनाना एक टेढ़ी खीर साबित होगा। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान इस कूटनीतिक दबाव को कैसे संभालता है।

ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और पाकिस्तानी मंत्री मोहसिन नकवी की यह अहम बैठक एक बहुत ही सकारात्मक कदम है। यह साफ तौर पर दिखाता है कि युद्ध से बचने के लिए बातचीत के दरवाजे अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। यह मुलाकात मध्य-पूर्व की आग को शांत करने के लिए परदे के पीछे चल रही कूटनीति का ही एक बड़ा हिस्सा है।

दुनिया भर के देशों को यह समझना होगा कि युद्ध से किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। आम नागरिक कभी भी युद्ध नहीं चाहता। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस तरह की शांति वार्ताओं से कोई ठोस रास्ता निकलेगा और दुनिया एक और बड़े महायुद्ध के विनाशकारी खतरे से सुरक्षित बाहर आ सकेगी।

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