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  • ईरान-इस्राइल युद्ध के बीच शांति की पहल: ईरानी विदेश मंत्री और पाकिस्तानी मंत्री मोहसिन नकवी की अहम मुलाकात

    ईरान-इस्राइल युद्ध के बीच शांति की पहल: ईरानी विदेश मंत्री और पाकिस्तानी मंत्री मोहसिन नकवी की अहम मुलाकात

    ईरान और इस्राइल के बीच इस समय दोनों तरफ से घातक हमले हो रहे हैं। इस भयानक सैन्य संघर्ष को शांत करने के लिए ही ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी से मुलाकात की है। दोनों देशों के बीच यह एक उच्च स्तरीय बैठक थी। इस बैठक में दोनों नेताओं ने मुख्य रूप से सुरक्षा और युद्ध को फैलने से रोकने पर बात की।

    मध्य-पूर्व यानी पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच कूटनीतिक मोर्चे पर शांति की एक नई और अहम पहल सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और पाकिस्तान के गृह व संघीय मंत्री मोहसिन नकवी ने आपस में एक लंबी और बेहद महत्वपूर्ण बातचीत की है। यह खबर इसलिए बहुत जरूरी है क्योंकि अगर ईरान और इस्राइल का यह युद्ध और भड़का, तो इसके शोले अरब देशों से निकलकर हमारे दक्षिण एशिया तक भी पहुंच जाएंगे। इस बैठक का मुख्य मकसद इसी बढ़ते महायुद्ध के खतरे को रोकना और इलाके में शांति बनाए रखना है।

    ईरान और इस्राइल के बीच इस समय दोनों तरफ से घातक हमले हो रहे हैं। इस भयानक सैन्य संघर्ष को शांत करने के लिए ही ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी से मुलाकात की है। दोनों देशों के बीच यह एक उच्च स्तरीय बैठक थी। इस बैठक में दोनों नेताओं ने मुख्य रूप से सुरक्षा और युद्ध को फैलने से रोकने पर बात की।

    पाकिस्तानी और ईरानी नेताओं ने इस बात पर खास चर्चा की कि इस्लामिक सहयोग संगठन को कैसे एकजुट किया जाए। वे चाहते हैं कि सभी बड़े मुस्लिम देश मिलकर एक साथ आएं। इसके जरिए गाजा, लेबनान और ईरान पर हो रहे लगातार हमलों को रुकवाने के लिए पूरी दुनिया पर एक कड़ा दबाव बनाया जा सकता है। इसके अलावा, दोनों नेताओं ने सीमा पर आतंकवाद रोकने और मानव तस्करी पर लगाम लगाने जैसे मुद्दों पर भी सहमति जताई।

    इस अचानक हुई मुलाकात के पीछे दोनों देशों की अपनी-अपनी गहरी चिंताएं हैं। ईरान इस समय चारों तरफ से अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों और इस्राइल के हमलों से घिरा हुआ है। ऐसे मुश्किल समय में ईरान को अपने पड़ोसी देशों के मजबूत साथ की बहुत जरूरत है। ईरान चाहता है कि युद्ध के दौरान उसकी पूर्वी सीमा यानी पाकिस्तान से सटी सीमा पूरी तरह सुरक्षित रहे।

    दूसरी तरफ पाकिस्तान के अपने हित भी इस बैठक से जुड़े हैं। पाकिस्तान इस समय एक बहुत ही भीषण आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। पाकिस्तान को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना की सख्त जरूरत है। यह पाइपलाइन लंबे समय से अमेरिका के डर से अटकी पड़ी है। इसके अलावा मोहसिन नकवी ने सीमा पर सक्रिय उग्रवादी गुटों के खिलाफ खुफिया जानकारी साझा करने पर भी जोर दिया, ताकि दोनों देशों की सुरक्षा मजबूत हो सके।

    ईरान और पाकिस्तान के आपसी रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं। दोनों के रिश्तों में कई बार भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इसी साल जनवरी के महीने में दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव इतना बढ़ गया था कि दोनों ने एक-दूसरे के इलाके में उग्रवादियों के ठिकानों पर मिसाइलें दाग दी थीं। उस घटना से दोनों देशों के रिश्ते काफी कड़वे हो गए थे।

    लेकिन अब ईरान और इस्राइल युद्ध के कारण हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। ईरान पर अब एक बड़ा बाहरी खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में ईरान रणनीतिक रूप से पाकिस्तान के साथ अपने संबंध सुधारना चाहता है। पाकिस्तान दुनिया का अकेला ऐसा मुस्लिम देश है जिसके पास परमाणु हथियार हैं। पाकिस्तान के साथ दोस्ती बढ़ाकर ईरान अमेरिका और इस्राइल को यह संदेश देना चाहता है कि वह इस लड़ाई में बिल्कुल भी अकेला नहीं है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही इन बैठकों का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ता है। अगर ईरान और इस्राइल के बीच यह युद्ध और भड़कता है, तो आम जनता की मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आएगा। तेल महंगा होने से पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे।

    जब ईंधन महंगा होता है, तो माल की ढुलाई का खर्च भी बढ़ जाता है। इससे खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा की हर जरूरी चीज आम आदमी की पहुंच से दूर होने लगेगी। इसके अलावा हमारे इलाके के लाखों लोग अरब देशों में काम करते हैं। युद्ध की स्थिति में उनकी नौकरियां और उनकी जान दोनों खतरे में पड़ सकती हैं। इसलिए इस शांति वार्ता के सफल होने से आम लोगों को महंगाई और बेरोजगारी के खतरे से काफी राहत मिल सकती है।

    यह शांति की राह इतनी भी आसान नहीं है। पाकिस्तान के लिए ईरान के साथ बहुत आगे तक जाना काफी मुश्किल है। इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका का भारी दबाव है। अमेरिका पाकिस्तान का एक बड़ा व्यापारिक साथी है। पाकिस्तान को अपनी डूबती अर्थव्यवस्था बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज चाहिए होता है, जिसमें अमेरिका की रजामंदी बहुत जरूरी होती है।

    इसके अलावा पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ भी बेहद गहरे रिश्ते हैं। हालांकि अब सऊदी अरब और ईरान के संबंध पहले से कुछ सुधरे हैं, लेकिन युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान के लिए इन सभी देशों के बीच संतुलन बनाना एक टेढ़ी खीर साबित होगा। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान इस कूटनीतिक दबाव को कैसे संभालता है।

    ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और पाकिस्तानी मंत्री मोहसिन नकवी की यह अहम बैठक एक बहुत ही सकारात्मक कदम है। यह साफ तौर पर दिखाता है कि युद्ध से बचने के लिए बातचीत के दरवाजे अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। यह मुलाकात मध्य-पूर्व की आग को शांत करने के लिए परदे के पीछे चल रही कूटनीति का ही एक बड़ा हिस्सा है।

    दुनिया भर के देशों को यह समझना होगा कि युद्ध से किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। आम नागरिक कभी भी युद्ध नहीं चाहता। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस तरह की शांति वार्ताओं से कोई ठोस रास्ता निकलेगा और दुनिया एक और बड़े महायुद्ध के विनाशकारी खतरे से सुरक्षित बाहर आ सकेगी।

  • ईरान-इस्राइल युद्ध के बीच खाली हुआ अमेरिका का मिसाइल भंडार, आधी ताकत हुई खत्म

    ईरान-इस्राइल युद्ध के बीच खाली हुआ अमेरिका का मिसाइल भंडार, आधी ताकत हुई खत्म

    पश्चिम एशिया में चल रही जंग के बीच एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। इस्राइल की रक्षा करते-करते अब खुद अमेरिका का मिसाइल भंडार आधा खाली हो चुका है। इस बड़े रक्षा संकट का असर पूरी दुनिया के देशों पर पड़ने वाला है। अगर यह हथियारों की कमी दूर नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।

    पश्चिम एशिया में चल रही जंग के बीच एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। इस्राइल की रक्षा करते-करते अब खुद अमेरिका का मिसाइल भंडार आधा खाली हो चुका है। इस बड़े रक्षा संकट का असर पूरी दुनिया के देशों पर पड़ने वाला है। अगर यह हथियारों की कमी दूर नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।

    ईरान और इस्राइल के बीच चल रहे भयंकर सैन्य संघर्ष के बीच अमेरिकी रक्षा मंत्रालय से एक बेहद गंभीर रिपोर्ट लीक हुई है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका के पास मौजूद हवा में मार करने वाली मिसाइलों का स्टॉक अब 50 फीसदी ही बचा है। यानी सुपरपावर कहे जाने वाले अमेरिका की आधी रक्षा क्षमता इस युद्ध में खत्म हो चुकी है।

    पेंटागन की इस गुप्त रिपोर्ट ने अमेरिकी सरकार और रक्षा विशेषज्ञों की चिंता को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। इस्राइल पर होने वाले लगातार हवाई हमलों को रोकने के चक्कर में अमेरिका को अपने सबसे आधुनिक हथियार गंवाने पड़े हैं। अमेरिका ने समुद्र में तैनात अपने बड़े युद्धपोतों से लगातार कीमती मिसाइलें दागी हैं।

    इस मिसाइल संकट के कारण अब अमेरिका के सामने अपने खुद के देश की सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। अमेरिकी रक्षा कंपनियां इतनी तेजी से नए हथियार नहीं बना पा रही हैं, जितनी तेजी से वे युद्ध में इस्तेमाल हो रहे हैं। इस वजह से उत्पादन और खपत के बीच का अंतर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

    इस कमी का सबसे बड़ा कारण ईरान की अनोखी युद्ध रणनीति है। ईरान बहुत ही सस्ते ड्रोन और सामान्य मिसाइलों से लगातार इस्राइल पर हमले कर रहा है। इन सस्ते हमलों को हवा में ही नष्ट करने के लिए अमेरिका को अपनी सबसे महंगी और अत्याधुनिक मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

    लागत का यह अंतर अमेरिका को भारी पड़ रहा है। ईरान का एक आत्मघाती ड्रोन जहाँ कुछ लाख रुपये में तैयार हो जाता है, वहीं उसे गिराने वाली अमेरिका की एक सिंगल मिसाइल की कीमत करीब 75 से 80 करोड़ रुपये होती है। इस आर्थिक और सैन्य नुकसान ने अमेरिका की कमर तोड़ दी है।

    इसके अलावा अमेरिकी रक्षा कंपनियां मांग के अनुसार उत्पादन नहीं कर पा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी नौसेना और वायुसेना के मिसाइल स्टॉक को वापस पहले जैसा करने में कम से कम 2 से 3 साल का समय लगेगा। इसमें अरबों डॉलर का अतिरिक्त खर्च भी आएगा।

    तीन मोर्चों का दबाव और अमेरिका का मिसाइल भंडार

    अमेरिका पिछले काफी समय से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे विवादों में सीधे तौर पर शामिल रहा है। वह पिछले चार सालों से यूक्रेन को रूस के खिलाफ युद्ध में लगातार एयर डिफेंस सिस्टम यानी हवा से होने वाले हमलों को रोकने वाली मिसाइलें सप्लाई कर रहा है। इससे उसका भंडार पहले ही कम था।

    दूसरी तरफ एशिया में चीन और ताइवान के बीच भी तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका को ताइवान की सुरक्षा के लिए भी अपने पास मिसाइलों का एक बड़ा बैकअप रखना बहुत जरूरी है। लेकिन इस्राइल और ईरान के इस अचानक छिड़े संकट ने अमेरिका की पूरी योजना को कमजोर करके रख दिया है।

    इतिहास में ऐसा पहली बार देखा जा रहा है जब दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति एक साथ तीन अलग-अलग मोर्चों पर फंस गई है। यूक्रेन, ताइवान और अब इस्राइल की मदद करने के चक्कर में अमेरिका का अपना खुद का रक्षा ढांचा अब पूरी तरह हांफने लगा है।

    व्यापार और उद्योग पर असर

    इस वैश्विक रक्षा संकट का सीधा और गहरा असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और उद्योगों पर दिखने लगा है। अमेरिका के रक्षा भंडार में आई इस भारी कमी के कारण दुनिया भर के शेयर बाजारों में निवेशकों के बीच डर का माहौल बन गया है। रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में भारी हलचल देखी जा रही है।

    हथियारों की इस कमी के कारण पश्चिम एशिया में युद्ध के लंबे समय तक खिंचने की आशंका बढ़ गई है। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण दुनिया भर के उद्योगों में माल बनाने और उसे भेजने की लागत बहुत ज्यादा बढ़ गई है।

    यदि अमेरिका इस संकट के कारण इस्राइल से अपने हाथ पीछे खींचता है, तो समुद्री व्यापारिक मार्ग पूरी तरह असुरक्षित हो जाएंगे। लाल सागर और भूमध्य सागर में मालवाहक जहाजों पर हमले बढ़ सकते हैं। इससे वैश्विक सप्लाई चेन यानी माल की आपूर्ति करने वाली श्रृंखला पूरी तरह टूट जाएगी, जिसका हर्जाना हर छोटे-बड़े उद्योग को भुगतना पड़ेगा।

    आने वाले दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नाटो के सहयोगी देशों पर आर्थिक और सैन्य मदद के लिए दबाव और ज्यादा बढ़ाएंगे। ट्रंप चाहते हैं कि यूरोपीय देश इस रक्षा घाटे और वित्तीय बोझ को आपस में साझा करें। जो देश मदद नहीं करेंगे, उन पर अमेरिका आने वाले समय में कड़े व्यापारिक प्रतिबंध लगा सकता है।

    दूसरी तरफ इस स्थिति का पूरा फायदा ईरान और उसके समर्थक गुट उठाने की कोशिश करेंगे। वे अमेरिका के मिसाइल स्टॉक को पूरी तरह खत्म करने के लिए अपने हमलों को और तेज कर सकते हैं। इसे युद्ध की भाषा में ‘थका देने वाला युद्ध’ कहा जाता है, जहां दुश्मन के संसाधनों को पूरी तरह से खत्म किया जाता है।

    इस्राइल के लिए भी अब आने वाला समय बहुत कठिन होने वाला है। यदि अमेरिका अपनी मिसाइलों को बचाने के लिए हाथ पीछे खींचता है, तो इस्राइल को पूरी तरह अपने आत्मनिर्भर सिस्टम पर निर्भर रहना होगा। लगातार हो रहे बड़े हवाई हमलों के सामने इस्राइल की सुरक्षा व्यवस्था के लिए यह एक बहुत बड़ी परीक्षा होगी।

    इस पूरी रिपोर्ट से यह साफ़ हो जाता है कि आधुनिक समय में कोई भी युद्ध केवल सैनिकों के दम पर नहीं जीता जा सकता। इसके लिए मजबूत सप्लाई चेन और हथियारों का लगातार उत्पादन होना बेहद ज़रूरी है। दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति होने के बावजूद अमेरिका आज एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है।

    इस संकट ने यह भी साबित कर दिया है कि अत्यधिक महंगे हथियारों पर निर्भरता कभी-कभी भारी पड़ सकती है। ईरान के सस्ते ड्रोन ने अमेरिका की अरबों डॉलर की तकनीक को घुटनों पर ला दिया है। अब देखना होगा कि अमेरिका इस स्थिति से उबरने के लिए क्या नया कूटनीतिक रास्ता चुनता है।

    पूरी दुनिया के लिए यह समय बहुत ही सतर्क रहने का है। महाशक्तियों के इस टकराव और हथियारों की कमी का असर अंततः वैश्विक अर्थव्यवस्था पर ही पड़ेगा। आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि दुनिया शांति की तरफ बढ़ेगी या एक और बड़े वैश्विक आर्थिक संकट की चपेट में आ जाएगी।

  • ईरान-इस्राइल युद्ध: नाटो देशों पर भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, दी बड़ी चेतावनी

    ईरान-इस्राइल युद्ध: नाटो देशों पर भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, दी बड़ी चेतावनी

    ईरान और इस्राइल के बीच चल रहे इस भयंकर युद्ध के दौरान अमेरिका लगातार इस्राइल की मदद कर रहा है। लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो यानी उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (यह पश्चिमी देशों का एक बड़ा सैन्य गठबंधन है) के देशों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ट्रंप का मानना है कि इस पूरे संकट का आर्थिक और सैन्य बोझ अकेले अमेरिका को उठाना पड़ रहा है।

    पश्चिम एशिया में चल रहा ईरान-इस्राइल युद्ध अब एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। इस महायुद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सहयोगी नाटो देशों के रवैये पर गहरी नाराजगी जताई है। यह खबर दुनिया भर के देशों के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि इसका सीधा असर वैश्विक सुरक्षा और व्यापार पर पड़ने वाला है। अगर नाटो देशों के बीच यह आपसी विवाद बढ़ता है, तो इससे पूरी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई ठप हो सकती है और महंगाई आसमान छू सकती है।

    ईरान और इस्राइल के बीच चल रहे इस भयंकर युद्ध के दौरान अमेरिका लगातार इस्राइल की मदद कर रहा है। लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो यानी उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (यह पश्चिमी देशों का एक बड़ा सैन्य गठबंधन है) के देशों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ट्रंप का मानना है कि इस पूरे संकट का आर्थिक और सैन्य बोझ अकेले अमेरिका को उठाना पड़ रहा है।

    व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार राष्ट्रपति ट्रंप ने नाटो के सदस्य देशों को पर्दे के पीछे से एक बहुत ही कड़ा संदेश भेजा है। उन्होंने साफ कहा है कि अगर यूरोपीय देशों को वैश्विक सुरक्षा में अमेरिका का साथ चाहिए, तो उन्हें इस जंग के खर्च में अपनी हिस्सेदारी तुरंत बढ़ानी होगी। ट्रंप ने उन देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की चेतावनी भी दी है जो इस संकट में अमेरिका के साथ खड़े नहीं हो रहे हैं।

    इतना ही नहीं, अमेरिका की खुफिया रिपोर्टों में एक बड़ा खुलासा हुआ है। इस्राइल को ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों से बचाने के लिए अमेरिका ने अपनी बहुत सारी एयर-डिफेंस मिसाइलें (यह हवा में ही दुश्मन की मिसाइल को नष्ट करने वाली तकनीक है) दागी हैं। इसके कारण अमेरिका का अपना खुद का रक्षा भंडार अब लगभग आधा खाली हो चुका है। ट्रंप इस बात से बेहद नाराज हैं कि यूरोपीय देश इस भारी नुकसान की भरपाई के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।

    विवाद की मुख्य वजह यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप नाटो देशों के इस रवैये को लंबे समय से एकतरफा मानते आए हैं। ट्रंप का कहना है कि संकट के समय यूरोपीय देश सिर्फ मूकदर्शक बनकर तमाशा देखते हैं। वे युद्ध का पूरा वित्तीय बोझ अकेले अमेरिका के कंधों पर डाल देते हैं।

    दूसरी तरफ यूरोपीय देशों जैसे फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन का इस मामले में अपना अलग ही सोचना है। ये देश इस युद्ध में सीधे तौर पर कूदने से लगातार बच रहे हैं। यूरोपीय देशों को डर है कि अगर उन्होंने इस लड़ाई में अमेरिका का खुलकर साथ दिया, तो यह एक पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध में बदल जाएगा। ऐसा होने पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था तबाह हो सकती है।

    इसके अलावा यूरोपीय देश पहले से ही अपनी सीमाओं के पास चल रहे रूस और यूक्रेन के बीच के संघर्ष से परेशान हैं। इस पुराने युद्ध के कारण यूरोप के देशों पर पहले से ही बहुत ज्यादा आर्थिक और सैन्य दबाव बना हुआ है। इसलिए वे मध्य-पूर्व यानी मिडिल ईस्ट के इस नए मोर्चे पर अपने कीमती संसाधन और पैसा नहीं झोंकना चाहते हैं।

    अमेरिका और नाटो देशों के बीच सैन्य खर्चों को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल में भी कई बार नाटो देशों को चेता चुके थे कि वे अपनी सुरक्षा के लिए पूरा पैसा खुद खर्च करें। ट्रंप हमेशा से ‘अमेरिका फर्स्ट’ यानी अमेरिका को सबसे पहले रखने की नीति पर काम करते आए हैं।

    इस बार ईरान और इस्राइल के बीच बढ़ा तनाव इस पुराने विवाद को दोबारा सतह पर ले आया है। ईरान लगातार इस्राइल पर मिसाइलों से हमले कर रहा है और इस्राइल को बचाने के लिए अमेरिका को अरबों डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। अमेरिका के रक्षा गोदाम खाली हो रहे हैं, जिससे अमेरिकी प्रशासन के भीतर नाटो के प्रति गुस्सा और ज्यादा बढ़ गया है।

    ईरान-इस्राइल युद्ध का व्यापार और उद्योग पर असर

    इस कूटनीतिक तनाव और युद्ध का सबसे बड़ा और सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर देखने को मिल रहा है। ईरान और इस्राइल के बीच छिड़ी इस जंग के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी उछाल आ गया है। तेल की कीमतें लगातार बढ़ने से दुनिया भर के बाजारों में हड़कंप मचा हुआ है।

    कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर भारत जैसे विकासशील देशों के व्यापार और उद्योग पर पड़ेगा। जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। इससे फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान की कीमत बढ़ जाती है और बाजारों में हर चीज महंगी होने लगती है। उद्योगों के लिए कच्चे माल का आयात करना भी अब काफी महंगा साबित हो रहा है।

    अगर नाटो देशों और अमेरिका के बीच यह आपसी तालमेल इसी तरह बिगड़ा रहा, तो आने वाले दिनों में तेल की सप्लाई पूरी तरह ठप हो सकती है। इससे दुनिया भर के शेयर बाजारों में भारी गिरावट आ सकती है। निवेशक अपना पैसा सुरक्षित जगहों पर लगाने के लिए बाजारों से निकाल रहे हैं, जिससे औद्योगिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।

    आने वाले दिनों में यदि नाटो के सदस्य देश अमेरिका की मदद के लिए आगे नहीं आते हैं, तो यह संकट और गहरा हो जाएगा। ऐसी स्थिति में इस्राइल और अमेरिका दोनों के लिए ईरान के बड़े हवाई हमलों को रोक पाना बहुत मुश्किल हो सकता है। हथियारों की भारी कमी के कारण सैन्य संतुलन पूरी तरह से बिगड़ सकता है।

    अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ट्रंप की इस सख्त चेतावनी के बाद नाटो देश क्या कदम उठाते हैं। क्या फ्रांस और जर्मनी जैसे बड़े यूरोपीय देश अमेरिका को आर्थिक मदद देने के लिए राजी होंगे, या फिर वे अपने रुख पर अड़े रहेंगे। यदि यूरोपीय देश पीछे हटते हैं, तो ट्रंप अमेरिका की तरफ से उनके व्यापार पर कड़े प्रतिबंध लगा सकते हैं।

    ईरान और इस्राइल का यह भयंकर सैन्य संघर्ष केवल दो देशों की लड़ाई तक सीमित नहीं रह गया है। इसने पश्चिमी देशों के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो के अंदरूनी मतभेदों और दरारों को पूरी तरह से दुनिया के सामने लाकर रख दिया है। संकट के इस दौर में महाशक्तियों की यह आपसी फूट बेहद चिंताजनक है।

    इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की दिशा बदलने वाली है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक नेता इस संकट को बातचीत से सुलझा पाते हैं या दुनिया एक और बड़े आर्थिक संकट की तरफ बढ़ जाएगी। फिलहाल पूरी दुनिया के बाजारों और आम लोगों के लिए आने वाला समय बड़ी चुनौतियों से भरा दिखाई दे रहा है।