ईरान-इस्राइल युद्ध के बीच खाली हुआ अमेरिका का मिसाइल भंडार, आधी ताकत हुई खत्म

अमेरिकी मिसाइल संकट

पश्चिम एशिया में चल रही जंग के बीच एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। इस्राइल की रक्षा करते-करते अब खुद अमेरिका का मिसाइल भंडार आधा खाली हो चुका है। इस बड़े रक्षा संकट का असर पूरी दुनिया के देशों पर पड़ने वाला है। अगर यह हथियारों की कमी दूर नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।

पश्चिम एशिया में चल रही जंग के बीच एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। इस्राइल की रक्षा करते-करते अब खुद अमेरिका का मिसाइल भंडार आधा खाली हो चुका है। इस बड़े रक्षा संकट का असर पूरी दुनिया के देशों पर पड़ने वाला है। अगर यह हथियारों की कमी दूर नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।

ईरान और इस्राइल के बीच चल रहे भयंकर सैन्य संघर्ष के बीच अमेरिकी रक्षा मंत्रालय से एक बेहद गंभीर रिपोर्ट लीक हुई है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका के पास मौजूद हवा में मार करने वाली मिसाइलों का स्टॉक अब 50 फीसदी ही बचा है। यानी सुपरपावर कहे जाने वाले अमेरिका की आधी रक्षा क्षमता इस युद्ध में खत्म हो चुकी है।

पेंटागन की इस गुप्त रिपोर्ट ने अमेरिकी सरकार और रक्षा विशेषज्ञों की चिंता को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। इस्राइल पर होने वाले लगातार हवाई हमलों को रोकने के चक्कर में अमेरिका को अपने सबसे आधुनिक हथियार गंवाने पड़े हैं। अमेरिका ने समुद्र में तैनात अपने बड़े युद्धपोतों से लगातार कीमती मिसाइलें दागी हैं।

इस मिसाइल संकट के कारण अब अमेरिका के सामने अपने खुद के देश की सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। अमेरिकी रक्षा कंपनियां इतनी तेजी से नए हथियार नहीं बना पा रही हैं, जितनी तेजी से वे युद्ध में इस्तेमाल हो रहे हैं। इस वजह से उत्पादन और खपत के बीच का अंतर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

इस कमी का सबसे बड़ा कारण ईरान की अनोखी युद्ध रणनीति है। ईरान बहुत ही सस्ते ड्रोन और सामान्य मिसाइलों से लगातार इस्राइल पर हमले कर रहा है। इन सस्ते हमलों को हवा में ही नष्ट करने के लिए अमेरिका को अपनी सबसे महंगी और अत्याधुनिक मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

लागत का यह अंतर अमेरिका को भारी पड़ रहा है। ईरान का एक आत्मघाती ड्रोन जहाँ कुछ लाख रुपये में तैयार हो जाता है, वहीं उसे गिराने वाली अमेरिका की एक सिंगल मिसाइल की कीमत करीब 75 से 80 करोड़ रुपये होती है। इस आर्थिक और सैन्य नुकसान ने अमेरिका की कमर तोड़ दी है।

इसके अलावा अमेरिकी रक्षा कंपनियां मांग के अनुसार उत्पादन नहीं कर पा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी नौसेना और वायुसेना के मिसाइल स्टॉक को वापस पहले जैसा करने में कम से कम 2 से 3 साल का समय लगेगा। इसमें अरबों डॉलर का अतिरिक्त खर्च भी आएगा।

तीन मोर्चों का दबाव और अमेरिका का मिसाइल भंडार

अमेरिका पिछले काफी समय से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे विवादों में सीधे तौर पर शामिल रहा है। वह पिछले चार सालों से यूक्रेन को रूस के खिलाफ युद्ध में लगातार एयर डिफेंस सिस्टम यानी हवा से होने वाले हमलों को रोकने वाली मिसाइलें सप्लाई कर रहा है। इससे उसका भंडार पहले ही कम था।

दूसरी तरफ एशिया में चीन और ताइवान के बीच भी तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका को ताइवान की सुरक्षा के लिए भी अपने पास मिसाइलों का एक बड़ा बैकअप रखना बहुत जरूरी है। लेकिन इस्राइल और ईरान के इस अचानक छिड़े संकट ने अमेरिका की पूरी योजना को कमजोर करके रख दिया है।

इतिहास में ऐसा पहली बार देखा जा रहा है जब दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति एक साथ तीन अलग-अलग मोर्चों पर फंस गई है। यूक्रेन, ताइवान और अब इस्राइल की मदद करने के चक्कर में अमेरिका का अपना खुद का रक्षा ढांचा अब पूरी तरह हांफने लगा है।

व्यापार और उद्योग पर असर

इस वैश्विक रक्षा संकट का सीधा और गहरा असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और उद्योगों पर दिखने लगा है। अमेरिका के रक्षा भंडार में आई इस भारी कमी के कारण दुनिया भर के शेयर बाजारों में निवेशकों के बीच डर का माहौल बन गया है। रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में भारी हलचल देखी जा रही है।

हथियारों की इस कमी के कारण पश्चिम एशिया में युद्ध के लंबे समय तक खिंचने की आशंका बढ़ गई है। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण दुनिया भर के उद्योगों में माल बनाने और उसे भेजने की लागत बहुत ज्यादा बढ़ गई है।

यदि अमेरिका इस संकट के कारण इस्राइल से अपने हाथ पीछे खींचता है, तो समुद्री व्यापारिक मार्ग पूरी तरह असुरक्षित हो जाएंगे। लाल सागर और भूमध्य सागर में मालवाहक जहाजों पर हमले बढ़ सकते हैं। इससे वैश्विक सप्लाई चेन यानी माल की आपूर्ति करने वाली श्रृंखला पूरी तरह टूट जाएगी, जिसका हर्जाना हर छोटे-बड़े उद्योग को भुगतना पड़ेगा।

आने वाले दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नाटो के सहयोगी देशों पर आर्थिक और सैन्य मदद के लिए दबाव और ज्यादा बढ़ाएंगे। ट्रंप चाहते हैं कि यूरोपीय देश इस रक्षा घाटे और वित्तीय बोझ को आपस में साझा करें। जो देश मदद नहीं करेंगे, उन पर अमेरिका आने वाले समय में कड़े व्यापारिक प्रतिबंध लगा सकता है।

दूसरी तरफ इस स्थिति का पूरा फायदा ईरान और उसके समर्थक गुट उठाने की कोशिश करेंगे। वे अमेरिका के मिसाइल स्टॉक को पूरी तरह खत्म करने के लिए अपने हमलों को और तेज कर सकते हैं। इसे युद्ध की भाषा में ‘थका देने वाला युद्ध’ कहा जाता है, जहां दुश्मन के संसाधनों को पूरी तरह से खत्म किया जाता है।

इस्राइल के लिए भी अब आने वाला समय बहुत कठिन होने वाला है। यदि अमेरिका अपनी मिसाइलों को बचाने के लिए हाथ पीछे खींचता है, तो इस्राइल को पूरी तरह अपने आत्मनिर्भर सिस्टम पर निर्भर रहना होगा। लगातार हो रहे बड़े हवाई हमलों के सामने इस्राइल की सुरक्षा व्यवस्था के लिए यह एक बहुत बड़ी परीक्षा होगी।

इस पूरी रिपोर्ट से यह साफ़ हो जाता है कि आधुनिक समय में कोई भी युद्ध केवल सैनिकों के दम पर नहीं जीता जा सकता। इसके लिए मजबूत सप्लाई चेन और हथियारों का लगातार उत्पादन होना बेहद ज़रूरी है। दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति होने के बावजूद अमेरिका आज एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है।

इस संकट ने यह भी साबित कर दिया है कि अत्यधिक महंगे हथियारों पर निर्भरता कभी-कभी भारी पड़ सकती है। ईरान के सस्ते ड्रोन ने अमेरिका की अरबों डॉलर की तकनीक को घुटनों पर ला दिया है। अब देखना होगा कि अमेरिका इस स्थिति से उबरने के लिए क्या नया कूटनीतिक रास्ता चुनता है।

पूरी दुनिया के लिए यह समय बहुत ही सतर्क रहने का है। महाशक्तियों के इस टकराव और हथियारों की कमी का असर अंततः वैश्विक अर्थव्यवस्था पर ही पड़ेगा। आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि दुनिया शांति की तरफ बढ़ेगी या एक और बड़े वैश्विक आर्थिक संकट की चपेट में आ जाएगी।

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