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  • ईरान-इस्राइल युद्ध के बीच शांति की पहल: ईरानी विदेश मंत्री और पाकिस्तानी मंत्री मोहसिन नकवी की अहम मुलाकात

    ईरान-इस्राइल युद्ध के बीच शांति की पहल: ईरानी विदेश मंत्री और पाकिस्तानी मंत्री मोहसिन नकवी की अहम मुलाकात

    ईरान और इस्राइल के बीच इस समय दोनों तरफ से घातक हमले हो रहे हैं। इस भयानक सैन्य संघर्ष को शांत करने के लिए ही ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी से मुलाकात की है। दोनों देशों के बीच यह एक उच्च स्तरीय बैठक थी। इस बैठक में दोनों नेताओं ने मुख्य रूप से सुरक्षा और युद्ध को फैलने से रोकने पर बात की।

    मध्य-पूर्व यानी पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच कूटनीतिक मोर्चे पर शांति की एक नई और अहम पहल सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और पाकिस्तान के गृह व संघीय मंत्री मोहसिन नकवी ने आपस में एक लंबी और बेहद महत्वपूर्ण बातचीत की है। यह खबर इसलिए बहुत जरूरी है क्योंकि अगर ईरान और इस्राइल का यह युद्ध और भड़का, तो इसके शोले अरब देशों से निकलकर हमारे दक्षिण एशिया तक भी पहुंच जाएंगे। इस बैठक का मुख्य मकसद इसी बढ़ते महायुद्ध के खतरे को रोकना और इलाके में शांति बनाए रखना है।

    ईरान और इस्राइल के बीच इस समय दोनों तरफ से घातक हमले हो रहे हैं। इस भयानक सैन्य संघर्ष को शांत करने के लिए ही ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी से मुलाकात की है। दोनों देशों के बीच यह एक उच्च स्तरीय बैठक थी। इस बैठक में दोनों नेताओं ने मुख्य रूप से सुरक्षा और युद्ध को फैलने से रोकने पर बात की।

    पाकिस्तानी और ईरानी नेताओं ने इस बात पर खास चर्चा की कि इस्लामिक सहयोग संगठन को कैसे एकजुट किया जाए। वे चाहते हैं कि सभी बड़े मुस्लिम देश मिलकर एक साथ आएं। इसके जरिए गाजा, लेबनान और ईरान पर हो रहे लगातार हमलों को रुकवाने के लिए पूरी दुनिया पर एक कड़ा दबाव बनाया जा सकता है। इसके अलावा, दोनों नेताओं ने सीमा पर आतंकवाद रोकने और मानव तस्करी पर लगाम लगाने जैसे मुद्दों पर भी सहमति जताई।

    इस अचानक हुई मुलाकात के पीछे दोनों देशों की अपनी-अपनी गहरी चिंताएं हैं। ईरान इस समय चारों तरफ से अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों और इस्राइल के हमलों से घिरा हुआ है। ऐसे मुश्किल समय में ईरान को अपने पड़ोसी देशों के मजबूत साथ की बहुत जरूरत है। ईरान चाहता है कि युद्ध के दौरान उसकी पूर्वी सीमा यानी पाकिस्तान से सटी सीमा पूरी तरह सुरक्षित रहे।

    दूसरी तरफ पाकिस्तान के अपने हित भी इस बैठक से जुड़े हैं। पाकिस्तान इस समय एक बहुत ही भीषण आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। पाकिस्तान को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना की सख्त जरूरत है। यह पाइपलाइन लंबे समय से अमेरिका के डर से अटकी पड़ी है। इसके अलावा मोहसिन नकवी ने सीमा पर सक्रिय उग्रवादी गुटों के खिलाफ खुफिया जानकारी साझा करने पर भी जोर दिया, ताकि दोनों देशों की सुरक्षा मजबूत हो सके।

    ईरान और पाकिस्तान के आपसी रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं। दोनों के रिश्तों में कई बार भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इसी साल जनवरी के महीने में दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव इतना बढ़ गया था कि दोनों ने एक-दूसरे के इलाके में उग्रवादियों के ठिकानों पर मिसाइलें दाग दी थीं। उस घटना से दोनों देशों के रिश्ते काफी कड़वे हो गए थे।

    लेकिन अब ईरान और इस्राइल युद्ध के कारण हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। ईरान पर अब एक बड़ा बाहरी खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में ईरान रणनीतिक रूप से पाकिस्तान के साथ अपने संबंध सुधारना चाहता है। पाकिस्तान दुनिया का अकेला ऐसा मुस्लिम देश है जिसके पास परमाणु हथियार हैं। पाकिस्तान के साथ दोस्ती बढ़ाकर ईरान अमेरिका और इस्राइल को यह संदेश देना चाहता है कि वह इस लड़ाई में बिल्कुल भी अकेला नहीं है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही इन बैठकों का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ता है। अगर ईरान और इस्राइल के बीच यह युद्ध और भड़कता है, तो आम जनता की मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आएगा। तेल महंगा होने से पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे।

    जब ईंधन महंगा होता है, तो माल की ढुलाई का खर्च भी बढ़ जाता है। इससे खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा की हर जरूरी चीज आम आदमी की पहुंच से दूर होने लगेगी। इसके अलावा हमारे इलाके के लाखों लोग अरब देशों में काम करते हैं। युद्ध की स्थिति में उनकी नौकरियां और उनकी जान दोनों खतरे में पड़ सकती हैं। इसलिए इस शांति वार्ता के सफल होने से आम लोगों को महंगाई और बेरोजगारी के खतरे से काफी राहत मिल सकती है।

    यह शांति की राह इतनी भी आसान नहीं है। पाकिस्तान के लिए ईरान के साथ बहुत आगे तक जाना काफी मुश्किल है। इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका का भारी दबाव है। अमेरिका पाकिस्तान का एक बड़ा व्यापारिक साथी है। पाकिस्तान को अपनी डूबती अर्थव्यवस्था बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज चाहिए होता है, जिसमें अमेरिका की रजामंदी बहुत जरूरी होती है।

    इसके अलावा पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ भी बेहद गहरे रिश्ते हैं। हालांकि अब सऊदी अरब और ईरान के संबंध पहले से कुछ सुधरे हैं, लेकिन युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान के लिए इन सभी देशों के बीच संतुलन बनाना एक टेढ़ी खीर साबित होगा। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान इस कूटनीतिक दबाव को कैसे संभालता है।

    ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और पाकिस्तानी मंत्री मोहसिन नकवी की यह अहम बैठक एक बहुत ही सकारात्मक कदम है। यह साफ तौर पर दिखाता है कि युद्ध से बचने के लिए बातचीत के दरवाजे अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। यह मुलाकात मध्य-पूर्व की आग को शांत करने के लिए परदे के पीछे चल रही कूटनीति का ही एक बड़ा हिस्सा है।

    दुनिया भर के देशों को यह समझना होगा कि युद्ध से किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। आम नागरिक कभी भी युद्ध नहीं चाहता। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस तरह की शांति वार्ताओं से कोई ठोस रास्ता निकलेगा और दुनिया एक और बड़े महायुद्ध के विनाशकारी खतरे से सुरक्षित बाहर आ सकेगी।

  • पीएम मोदी का नॉर्वे कार्टून विवाद: अखबार की शर्मनाक हरकत से भारतीयों में गुस्सा

    पीएम मोदी का नॉर्वे कार्टून विवाद: अखबार की शर्मनाक हरकत से भारतीयों में गुस्सा

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए नॉर्वे की राजधानी ओस्लो गए थे। इसी दौरान नॉर्वे के सबसे बड़े अखबारों में से एक ‘आफ्टेनपोस्टेन’ ने एक विवादित लेख छापा। इस लेख को फ्रैंक रॉसाविक नाम के पत्रकार ने लिखा था।

    इन दिनों पीएम मोदी का नॉर्वे कार्टून विवाद काफी चर्चा में है। नॉर्वे के एक जाने-माने अखबार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक ऐसा कार्टून छापा है, जिसने कूटनीतिक हलकों और आम लोगों के बीच बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया है। यह घटना प्रधानमंत्री की हाल ही में हुई ओस्लो यात्रा से जुड़ी है।

    इस विवादित कार्टून में भारत के प्रधानमंत्री को सपेरा दिखाया गया है। इस तस्वीर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। यह पूरी घटना दिखाती है कि पश्चिमी देश आज भी भारत को लेकर अपनी पुरानी और घिसी-पिटी सोच से बाहर नहीं आ पाए हैं।

    इस हरकत का सीधा असर भारत और यूरोपीय देशों के रिश्तों पर पड़ सकता है। आम भारतीय नागरिक इस घटना को अपने देश और नेता के अपमान के रूप में देख रहे हैं। यह खबर इसलिए भी अहम है क्योंकि यह दिखाती है कि दुनिया में तेजी से आगे बढ़ते भारत को पश्चिमी मीडिया किस नजर से देखता है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए नॉर्वे की राजधानी ओस्लो गए थे। इसी दौरान नॉर्वे के सबसे बड़े अखबारों में से एक ‘आफ्टेनपोस्टेन’ ने एक विवादित लेख छापा। इस लेख को फ्रैंक रॉसाविक नाम के पत्रकार ने लिखा था।

    इस लेख का शीर्षक “एक चालाक और थोड़ा परेशान करने वाला आदमी” रखा गया था। सबसे ज्यादा बवाल लेख के साथ छपे कार्टून पर हो रहा है। इसमें पीएम मोदी को पारंपरिक कपड़े पहनाकर सपेरे की तरह पालथी मारकर बैठे हुए दिखाया गया है।

    कार्टून में वह एक बीन बजा रहे हैं, लेकिन सामने रखी टोकरी से सांप की जगह पेट्रोल पंप का पाइप बाहर निकल रहा है। यह लेख वैसे तो 16 मई को छपा था, लेकिन जैसे ही पीएम मोदी ओस्लो पहुंचे, यह तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई और बड़ा विवाद बन गई।

    इस कार्टून के पीछे की मुख्य वजह पश्चिमी मीडिया की भारत के प्रति पुरानी और नस्लवादी सोच है। पश्चिमी देश अभी भी भारत को एक पिछड़े देश के रूप में देखने की गलती करते हैं। वे इस बात को नहीं पचा पा रहे हैं कि भारत आज अपने फैसले खुद ले रहा है।

    कार्टून में सांप की जगह पेट्रोल का पाइप दिखाना एक खास इशारा है। यह शायद इसलिए दिखाया गया है क्योंकि भारत पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है। अखबार ने इसी बात को लेकर एक भद्दा मजाक बनाने की कोशिश की है।

    इसके अलावा, ओस्लो में एक और घटना हुई थी जिसने आग में घी का काम किया। नॉर्वे की एक पत्रकार ने पीएम मोदी से प्रेस की आजादी पर सवाल पूछा था। जब पीएम वहां से चले गए, तो भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़ा जवाब दिया। भारतीय अधिकारी ने कहा कि पश्चिमी देश बिना समझे भारत पर उंगली उठाते हैं।

    इस विवाद को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। सालों से पश्चिमी देश भारत को “सपेरों का देश” मानते रहे हैं। यह उनकी पुरानी राज करने वाली सोच का हिस्सा है। वे मानते थे कि भारत में केवल जादू-टोना और सपेरे ही होते हैं।

    साल 2014 में अमेरिका के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में पीएम मोदी ने एक बहुत मशहूर भाषण दिया था। उन्होंने वहां डंके की चोट पर कहा था कि भारत अब सपेरों का देश नहीं रहा। उन्होंने बताया था कि हमारे युवा अब कंप्यूटर के ‘माउस’ से दुनिया को अपना दीवाना बना रहे हैं।

    आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। हमारी डिजिटल तकनीक और व्यापार का दुनिया लोहा मान रही है। इसके बावजूद, एक दशक बाद किसी बड़े यूरोपीय अखबार का वही सपेरे वाली तस्वीर छापना उनकी छोटी सोच को उजागर करता है।

    इस कार्टून को लेकर आम भारतीयों में भारी गुस्सा है। सोशल मीडिया पर लोग इस अखबार और पश्चिमी मीडिया को जमकर खरी-खोटी सुना रहे हैं। लोगों का कहना है कि यह सीधा-सीधा भारत का अपमान है और इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

    आम नागरिक इसे पश्चिमी देशों की “खुल्लम-खुल्ला नस्लवादी” सोच बता रहे हैं। उनका मानना है कि गोरे लोग अभी भी खुद को बेहतर समझते हैं और भारत की तरक्की उनसे देखी नहीं जा रही है। यह विवाद भारतीयों की राष्ट्रीय भावना को ठेस पहुंचा रहा है।

    लोगों को लगता है कि विदेशी मीडिया भारत की नई पहचान को स्वीकार नहीं करना चाहता। जिस तरह से भारत आज पूरी दुनिया में अपना दबदबा बना रहा है, उससे पश्चिमी देशों में जलन की भावना पैदा हो गई है। यह गुस्सा सोशल मीडिया पर साफ देखा जा सकता है।

    इस घटना के बाद भारत और नॉर्वे के बीच कूटनीतिक बातचीत में तनाव आ सकता है। भारत सरकार इस अपमानजनक कार्टून को लेकर नॉर्वे के सामने अपना कड़ा विरोध दर्ज करा सकती है। विदेश मंत्रालय इस मामले पर आधिकारिक बयान भी जारी कर सकता है।

    यूरोप और दूसरे देशों में रहने वाले भारतीय इस अखबार के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर इस अखबार का बहिष्कार करने की मांग पहले ही उठने लगी है। आने वाले दिनों में यह अभियान और तेज हो सकता है।

    भारत पश्चिमी मीडिया के इस तरह के हमलों का पहले से ज्यादा मजबूती से जवाब देगा। सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को खराब करने की ऐसी कोशिशों को बर्दाश्त न किया जाए।

    नॉर्वे के अखबार में छपा पीएम मोदी का यह कार्टून केवल एक तस्वीर नहीं है, बल्कि यह पश्चिमी मीडिया की बीमार मानसिकता का सबूत है। यह दिखाता है कि भारत की तरक्की और स्वतंत्र विदेश नीति ने कुछ विदेशी ताकतों को कितना परेशान कर दिया है।

    भारत अब वह देश नहीं रहा जो किसी के भी अपमान को चुपचाप सह ले। सपेरे की छवि से निकलकर भारत अब दुनिया को राह दिखाने वाला देश बन चुका है। पश्चिमी देशों को यह हकीकत जल्द से जल्द स्वीकार कर लेनी चाहिए, वरना दुनिया में उनकी खुद की साख गिरती जाएगी।

  • पश्चिम एशिया संकट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा समीक्षा बैठक, नागरिकों की सुरक्षा और व्यापारिक हितों पर बड़ा फैसला

    पश्चिम एशिया संकट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा समीक्षा बैठक, नागरिकों की सुरक्षा और व्यापारिक हितों पर बड़ा फैसला

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा समीक्षा बैठक में पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा हुई। भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और तेल की कीमतों पर नई रणनीति बनी।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा समीक्षा बैठक देश के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण घटना बन गई है। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारत के नागरिकों और देश की आर्थिक स्थिति पर पड़ने की आशंका है। इस बैठक में लिए गए फैसलों से तय होगा कि संकट के इस दौर में भारत अपने हितों की रक्षा कैसे करेगा।

    सरकार की इस उच्चस्तरीय चर्चा का मुख्य उद्देश्य विदेश में रहने वाले लाखों भारतीयों को सुरक्षित रखना है। इसके साथ ही देश में आने वाले सामान और कच्चे तेल की सप्लाई को बिना किसी बाधा के जारी रखना भी एक बड़ी चुनौती है। आम जनता के बजट और देश की सुरक्षा के लिहाज से यह बैठक बेहद संवेदनशील समय पर बुलाई गई है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने विदेश दौरे से लौटते ही एक आपातकालीन बैठक बुलाई। इस बैठक में देश के शीर्ष मंत्रियों और सुरक्षा सलाहकारों ने भाग लिया। बैठक के दौरान पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति और उससे उत्पन्न खतरों की विस्तृत समीक्षा की गई।

    बैठक में गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर मौजूद थे। इसके अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी एनएसए (NSA – राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों पर प्रधानमंत्री के मुख्य सलाहकार) अजीत डोभाल भी शामिल हुए। सभी ने अपने-अपने विभागों से जुड़े इनपुट प्रधानमंत्री के सामने रखे।

    प्रधानमंत्री ने सभी सुरक्षा एजेंसियों और मंत्रालयों को मिलकर काम करने के सख्त निर्देश दिए हैं। उन्होंने साफ किया कि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए भारत की तैयारी पूरी होनी चाहिए। नौसेना को समुद्री मार्गों पर गश्त बढ़ाने और कड़े कदम उठाने के लिए कहा गया है।

    पश्चिम एशिया के देशों में अचानक तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इस क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनने से पूरी दुनिया का ध्यान इस तरफ गया है। भारत के लिए यह क्षेत्र रणनीतिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टिकोण से बहुत अधिक महत्व रखता है।

    लाल सागर और अदन की खाड़ी जैसे मुख्य समुद्री रास्तों पर व्यापारिक जहाजों पर लगातार हमले हो रहे हैं। ड्रोन और मिसाइल हमलों के कारण भारतीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को बड़ा खतरा पैदा हो गया है। इसी गंभीर चुनौती को देखते हुए प्रधानमंत्री ने यह आपात बैठक बुलाई।

    इसके अलावा पश्चिम एशिया के देशों में भारत के लाखों लोग नौकरी और व्यापार करते हैं। वहां युद्ध भड़कने की स्थिति में इन नागरिकों की जान को खतरा हो सकता है। सरकार ने पहले ही भांप लिया है कि समय रहते ठोस योजना बनाना कितना जरूरी है।

    पृष्ठभूमि: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा समीक्षा बैठक का आधार

    भारत और पश्चिम एशिया के देशों के बीच संबंध हमेशा से बेहद मजबूत और गहरे रहे हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल इन्हीं देशों से खरीदता है। इसलिए वहां होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर भारत के घरेलू बाजारों पर पड़ता है।

    पिछले कुछ समय से इस पूरे क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे इस तनाव के कारण वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल मची है। भारत सरकार पहले भी संकट के समय अपने नागरिकों को विदेशों से सुरक्षित निकालती रही है।

    भारतीय नौसेना पहले से ही ‘ऑपरेशन संकल्प’ (समुद्री जहाजों की सुरक्षा के लिए चलाया जाने वाला विशेष अभियान) के तहत मुस्तैद है। लेकिन मौजूदा संकट की गंभीरता को देखते हुए अब सुरक्षा व्यवस्था को नए सिरे से मजबूत करना अनिवार्य हो गया था। इसी वजह से इस पृष्ठभूमि में यह सुरक्षा बैठक आयोजित की गई।

    इस संकट का सबसे बड़ा और सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी। इसके कारण भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम महंगे हो सकते हैं।

    ईंधन के दाम बढ़ने से माल ढुलाई महंगी हो जाती है, जिससे फल, सब्जियां और अन्य जरूरी सामान भी महंगे हो जाते हैं। इससे आम आदमी के घर का बजट पूरी तरह बिगड़ सकता है। सरकार इसी महंगाई को रोकने के लिए रणनीति तैयार कर रही है।

    दूसरा बड़ा असर उन परिवारों पर पड़ेगा जिनके सदस्य नौकरी के सिलसिले में खाड़ी देशों में रहते हैं। उनकी सुरक्षा को लेकर देश में रहने वाले उनके रिश्तेदार काफी चिंतित हैं। सरकार के सुरक्षा प्लान से इन परिवारों को थोड़ी राहत जरूर मिलेगी।

    सरकार ने विदेश मंत्रालय को प्रभावित क्षेत्रों में चौबीसों घंटे चालू रहने वाला कंट्रोल रूम बनाने का निर्देश दिया है। वहां फंसे भारतीय नागरिकों की मदद के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किए जाएंगे। जरूरत पड़ने पर लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की योजना पर तुरंत अमल किया जाएगा।

    भारतीय नौसेना अरब सागर और हिंद महासागर में अपने युद्धपोतों की तैनाती बढ़ाएगी। व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा घेरा प्रदान किया जाएगा ताकि आयात-निर्यात का काम बिना रुके चलता रहे। सरकार ने कच्चे तेल के अपने रणनीतिक भंडारों की स्थिति को भी मजबूत रखने का फैसला किया है।

    कूटनीतिक स्तर पर भारत किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय शांति का रास्ता अपनाने की अपील जारी रखेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस पूरे मामले में वैश्विक नेताओं के साथ बातचीत कर सकते हैं। आने वाले दिनों में भारत की कूटनीति और अधिक सक्रिय दिखाई देगी।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा समीक्षा बैठक से यह साफ हो गया है कि सरकार हर परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार है। देश की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता बनाए रखना सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता है। संकट बड़ा है, लेकिन सही समय पर उठाए गए कदम इसके नुकसान को कम कर सकते हैं।

    नागरिकों की सुरक्षा के लिए कड़े फैसले और समुद्री व्यापार की रक्षा के उपाय भारत की मजबूत स्थिति को दर्शाते हैं। आम जनता को घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि प्रशासनिक और सैन्य स्तर पर पूरी तैयारी कर ली गई है। सरकार स्थिति पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए हुए है।