सीबीएसई की तीन भाषा नीति का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जानिए 9वीं के छात्रों पर क्या होगा इसका सीधा असर

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सीबीएसई की नई तीन भाषा नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर हुई है। जानिए कक्षा 9 के छात्रों के लिए यह नया नियम क्या है और इससे उन पर क्या असर पड़ेगा।

सीबीएसई यानी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों और उनके माता-पिता के लिए यह एक बहुत ही अहम खबर है। बोर्ड ने कक्षा 9 के लिए एक नया नियम लागू करने का आदेश दिया है, जिसमें बच्चों को अब अनिवार्य रूप से तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। इस अचानक आए नियम से देशभर के छात्रों और अभिभावकों की चिंता काफी बढ़ गई है। अब यह पूरा मामला देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। इस अदालत के फैसले का सीधा असर गांव-कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक में पढ़ने वाले लाखों छात्रों के भविष्य पर पड़ेगा।

शुक्रवार को सीबीएसई की नई तीन भाषा नीति को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका में छात्रों और शिक्षकों की तरफ से अदालत से गुहार लगाई गई है कि वह इस नए नियम पर तुरंत रोक लगाए। मामले की गंभीरता को देखते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस पर अपनी सहमति दे दी है। अदालत ने अगले हफ्ते इस मुद्दे पर विस्तार से सुनवाई करने का फैसला किया है।

याचिकाकर्ताओं की तरफ से देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने अदालत में अपनी बात रखी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि 9वीं कक्षा में आने के बाद बच्चों पर अचानक से नई भाषाओं का भारी बोझ डालना बिल्कुल भी उचित नहीं है। अगले ही साल इन बच्चों को 10वीं की अहम बोर्ड परीक्षा देनी है। ऐसे में अचानक एक नई भाषा सीखना और उसमें परीक्षा देना बच्चों के लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा। वकील के अनुसार, इस नियम से बच्चों में भारी तनाव और स्कूलों में अफरा-तफरी का माहौल बन जाएगा।

विवाद की असली जड़ 15 मई को सीबीएसई द्वारा जारी किया गया एक नया सर्कुलर है। इस आदेश के अनुसार 1 जुलाई 2026 से नया पढ़ाई का सत्र शुरू होने पर, कक्षा 9 के सभी बच्चों के लिए तीन भाषाओं की पढ़ाई करना एकदम जरूरी कर दिया गया है। सबसे बड़ी शर्त यह रखी गई है कि इन तीन में से कम से कम दो भारत की अपनी मूल स्थानीय भाषाएं होनी चाहिए।

बोर्ड ने यह भी साफ कर दिया कि अगर कोई बच्चा फ्रेंच, जर्मन या स्पेनिश जैसी कोई विदेशी भाषा सीखना चाहता है, तो वह उसे तीसरी भाषा के रूप में तभी ले सकता है जब बाकी दोनों भाषाएं भारतीय हों। अगर वह ऐसा नहीं करता, तो विदेशी भाषा को एक चौथी और अतिरिक्त भाषा के तौर पर पढ़ना होगा। सीबीएसई ने यह बड़ा बदलाव सरकार की नई शिक्षा नीति 2020 के तहत किया है। सरकार का मुख्य मकसद यह है कि बच्चे अपनी मातृभाषा और देश की अन्य भाषाओं को अच्छी तरह से जानें।

हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में भाषा हमेशा से एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा रही है। नई शिक्षा नीति में इस बात पर बहुत जोर दिया गया है कि बच्चों को एक से ज्यादा भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए। इससे पहले ज्यादातर स्कूलों में केवल दो भाषाओं का ही चलन था। इनमें आमतौर पर हिंदी और अंग्रेजी या फिर कोई एक क्षेत्रीय भाषा शामिल होती थी।

लेकिन अब शिक्षा विभाग चाहता है कि बच्चे अपनी जड़ों और संस्कृति से और गहराई से जुड़ें। इसी सोच के साथ बहुभाष्यता यानी एक साथ कई भाषाओं को जानने की नीति लाई गई। हालांकि, बोर्ड ने यह बदलाव बहुत ही कम समय में अचानक किया है। इससे स्कूलों को अपनी तैयारी पूरी करने का पर्याप्त मौका नहीं मिला है। अचानक नए शिक्षकों की व्यवस्था करना और किताबों का इंतजाम करना स्कूलों के प्रबंधन के लिए एक बड़ी परेशानी बन गया है।

इस नए सरकारी नियम का सबसे सीधा और बड़ा असर 9वीं कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों पर पड़ने वाला है। बच्चों के मन में यह डर बैठ गया है कि कहीं इस नई भाषा को सीखने के चक्कर में उनके गणित और विज्ञान जैसे जरूरी विषयों के नंबर कम न हो जाएं। यह उम्र बच्चों के लिए पहले से ही काफी दबाव वाली होती है।

हालांकि, बोर्ड ने बच्चों का थोड़ा तनाव कम करने के लिए कुछ राहत भी दी है। सीबीएसई ने साफ किया है कि 10वीं कक्षा में इस तीसरी भाषा का कोई मुख्य बोर्ड पेपर नहीं लिया जाएगा। इसका मूल्यांकन स्कूल अपने स्तर पर ही करेगा। इस तीसरी भाषा के ग्रेड 10वीं की मार्कशीट में जरूर लिखे जाएंगे, लेकिन इस विषय के कारण किसी भी बच्चे को बोर्ड परीक्षा देने से नहीं रोका जाएगा। फिर भी, एक नई किताब पढ़ना और उसके असाइनमेंट पूरे करना छात्रों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

अब देशभर के लाखों छात्रों, उनके माता-पिता और स्कूल प्रबंधन की नजरें सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत अगले सप्ताह इस पूरे मामले की गहराई से सुनवाई करेगी। कोर्ट की बहस में यह तय किया जाएगा कि क्या सीबीएसई 1 जुलाई से अपनी इस नई नीति को पूरे देश में लागू कर पाएगा, या फिर बच्चों के हित को देखते हुए फिलहाल इस पर रोक लगा दी जाएगी।

अगर अदालत इस नियम पर रोक लगा देती है, तो बच्चों को बड़ी राहत मिलेगी। वहीं स्कूलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती नई भाषाओं के शिक्षकों को ढूंढना है। इसके लिए बोर्ड ने स्कूलों को थोड़ी छूट दी है। स्कूल चाहें तो ऑनलाइन और ऑफलाइन मिलाकर पढ़ाई करवा सकते हैं। इसके अलावा वे रिटायर्ड शिक्षकों या भाषा की थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाले दूसरे विषय के टीचरों की मदद भी ले सकते हैं।

बच्चों की शिक्षा व्यवस्था में समय-समय पर बदलाव होना जरूरी है, लेकिन यह बदलाव उन पर मानसिक बोझ नहीं बनना चाहिए। सीबीएसई का अपनी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने का विचार सिद्धांत रूप में बहुत अच्छा है। लेकिन बिना पूरी तैयारी के इसे इतनी जल्दी लागू करने का तरीका लोगों को रास नहीं आ रहा है। आधी-अधूरी तैयारी से अक्सर फायदे की जगह नुकसान ज्यादा होता है।

अब सुप्रीम कोर्ट को यह देखना होगा कि नई शिक्षा नीति को आगे बढ़ाने के लक्ष्य और बच्चों की सहूलियत के बीच सही संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। सबको उम्मीद है कि अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर कोई ऐसा समझदारी भरा फैसला सुनाएगी, जो छात्रों के भविष्य के लिए सबसे अच्छा हो और उनकी पढ़ाई का तनाव भी कम कर सके।

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