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  • अमेरिका में ग्रीन कार्ड का नया नियम: ट्रंप प्रशासन का बड़ा फैसला, लाखों भारतीयों को लौटना पड़ सकता है देश

    अमेरिका में ग्रीन कार्ड का नया नियम: ट्रंप प्रशासन का बड़ा फैसला, लाखों भारतीयों को लौटना पड़ सकता है देश

    डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका में ग्रीन कार्ड के नियमों को बहुत कड़ा कर दिया है। अब विदेशी नागरिकों को ग्रीन कार्ड के आवेदन के लिए अपने मूल देश वापस लौटना होगा।

    डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका में स्थायी निवास (Permanent Residency) यानी ग्रीन कार्ड (Green Card) चाहने वाले विदेशियों के लिए एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक नियम लागू किया है। 22 मई 2026 को अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा (USCIS) द्वारा जारी किए गए इस नए नियम से जुड़ी अहम जानकारियां इस प्रकार हैं:

    1. क्या है नया नियम?

    • मूल देश लौटना होगा अनिवार्य: अब अमेरिका में अस्थायी वीज़ा (जैसे- स्टूडेंट वीज़ा, टूरिस्ट वीज़ा या वर्क वीज़ा) पर रह रहे विदेशी नागरिकों को ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने के लिए वापस अपने मूल देश (Home Country) लौटना होगा।
    • कंसुलर प्रोसेसिंग: इन लोगों को अब अमेरिका के अंदर से अपनी आव्रजन स्थिति को बदलने (Adjustment of Status) की अनुमति नहीं होगी। उन्हें अपने देश में स्थित अमेरिकी दूतावास या वाणिज्य दूतावास (US Consulate) के जरिए ही ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन (Consular Processing) करना होगा।

    2. किन लोगों पर पड़ेगा असर?

    • भारतीयों पर बड़ा असर: इस नियम का सबसे ज्यादा असर अमेरिका में H-1B और L-1 वर्क वीज़ा पर काम कर रहे हजारों भारतीय आईटी पेशेवरों और F-1 वीज़ा पर पढ़ाई कर रहे छात्रों पर पड़ेगा।
    • 12 लाख लोग प्रभावित: अमेरिका में फिलहाल 12 लाख से ज्यादा लोग ऐसे हैं, जिनके ग्रीन कार्ड के आवेदन पेंडिंग हैं। इस नियम के तहत अब इन कानूनी प्रवासियों को ‘सेल्फ-डिपोर्ट’ (स्वयं निर्वासन) होना पड़ सकता है।
    • पारिवारिक अलगाव: जो विदेशी नागरिक अमेरिकी नागरिकों से विवाहित हैं, उन्हें भी इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अपना परिवार छोड़कर अपने देश लौटना पड़ सकता है।

    3. पहले क्या नियम था?

    • पिछले 50 से अधिक सालों से यह नियम था कि अमेरिका में कानूनी तौर पर रह रहे विदेशी नागरिक (स्टूडेंट, वर्कर, शरणार्थी आदि) बिना अमेरिका छोड़े, वहीं रहते हुए अपनी वीज़ा स्थिति को ‘एडजस्ट’ करवाकर ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते थे और पूरी प्रक्रिया अमेरिका में ही पूरी हो जाती थी।

    4. अमेरिका ने यह फैसला क्यों लिया?

    • “कानून का मूल उद्देश्य”: USCIS के प्रवक्ता जैक कहलर ने कहा कि यह बदलाव “कानून के मूल उद्देश्य” की ओर लौटने का प्रयास है। उन्होंने तर्क दिया कि गैर-अप्रवासी (जैसे छात्र या टूरिस्ट) अमेरिका में एक छोटे समय और खास मकसद के लिए आते हैं। उनका मकसद पूरा होने के बाद उन्हें वापस लौट जाना चाहिए; उनका यह दौरा ग्रीन कार्ड हासिल करने की “पहली सीढ़ी” नहीं होना चाहिए।
    • संसाधनों की बचत: अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) का कहना है कि यह काम अब अमेरिकी विदेश विभाग (State Department) के जिम्मे होगा। इससे USCIS के संसाधन बचेंगे, जिनका इस्तेमाल गंभीर मामलों (जैसे- मानव तस्करी और हिंसक अपराध के पीड़ितों) को सुलझाने में किया जाएगा।

    5. क्या कोई छूट (Exceptions) मिलेगी?

    • USCIS ने कहा है कि अब अमेरिका के अंदर रहते हुए ‘एडजस्टमेंट ऑफ स्टेटस’ केवल “असाधारण परिस्थितियों” (Extraordinary Circumstances) में ही दिया जाएगा।
    • यह पूरी तरह से आव्रजन अधिकारी के ‘विशेषाधिकार’ (Discretion) पर निर्भर करेगा। अधिकारी हर केस की अलग-अलग जांच करेंगे (जैसे- कोई पुराना उल्लंघन तो नहीं, चरित्र कैसा है आदि) और तय करेंगे कि आवेदक को अमेरिका में रहने की छूट दी जाए या उसे वापस भेजा जाए।

    6. इस नियम के गंभीर खतरे और विरोध

    • वापस न लौट पाने का डर: अप्रवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाले वकीलों और संगठनों (जैसे HIAS) ने चेतावनी दी है कि जो लोग इस प्रक्रिया के तहत अपने देश लौटेंगे, हो सकता है कि उन्हें दोबारा अमेरिका में प्रवेश ही न करने दिया जाए।
    • ट्रंप प्रशासन की नीतियां: आलोचकों का मानना है कि यह नियम ट्रंप प्रशासन की कानूनी और गैर-कानूनी, दोनों तरह के इमिग्रेशन को रोकने की उस बड़ी नीति का हिस्सा है, जिसके तहत पहले ही कई देशों पर ‘ट्रैवल बैन’ (Travel Ban) लगाए जा चुके हैं और शरणार्थियों को ग्रीन कार्ड देने पर रोक लगाई गई है।

    संक्षेप में, यह नियम अमेरिका में पढ़ाई और नौकरी के सहारे बसने का सपना देखने वाले लाखों प्रवासियों, विशेषकर भारतीयों के लिए एक बहुत बड़ा झटका है।

  • इवांका ट्रंप की हत्या की साजिश नाकाम, सुलेमानी की मौत का बदला लेने आया आतंकी गिरफ्तार

    इवांका ट्रंप की हत्या की साजिश नाकाम, सुलेमानी की मौत का बदला लेने आया आतंकी गिरफ्तार

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप की हत्या की बड़ी साजिश नाकाम हो गई है। सुलेमानी की मौत का बदला लेने आए एक इराकी आतंकी को अमेरिका में गिरफ्तार किया गया है।

    अमेरिका से एक बड़ी और हैरान करने वाली खबर सामने आई है। इवांका ट्रंप की हत्या की साजिश का पर्दाफाश हुआ है। जांच एजेंसियों ने एक अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क से जुड़े शख्स को गिरफ्तार किया है। यह आतंकी ईरान के कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत का बदला लेना चाहता था। यह घटना दिखाती है कि अमेरिका और वहां के शीर्ष नेताओं के परिवारों पर आतंकी हमले का खतरा कितना गहरा है। इस खुलासे के बाद अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह से सतर्क हो गई हैं और सुरक्षा व्यवस्था को पहले से कहीं ज्यादा सख्त कर दिया गया है।

    अमेरिका और यूरोप की खुफिया एजेंसियों ने मिलकर एक बड़े आतंकी नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है। इस मामले में मोहम्मद बाकर साद दाऊद अल-सादी नाम के एक 32 साल के इराकी नागरिक को पकड़ा गया है। अमेरिका के न्याय विभाग के मुताबिक, इस खतरनाक आतंकी को 15 मई 2026 को तुर्की में गिरफ्तार किया गया था।

    तुर्की से इस आतंकी को अमेरिका सौंप दिया गया है। फिलहाल यह आतंकी न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में मौजूद एक जेल में बंद है। उसे जेल में एकांत कारावास यानी सबसे अलग और कड़ी सुरक्षा वाली जगह में रखा गया है।

    जांच के दौरान एजेंसियों को इस आतंकी के पास से फ्लोरिडा में मौजूद इवांका ट्रंप और उनके पति जेरेड कुशनर के आलीशान घर का पूरा नक्शा मिला है। इस आतंकी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इवांका के घर वाले इलाके की एक तस्वीर भी डाली थी। इसके साथ ही उसने अरबी भाषा में एक खतरनाक संदेश लिखकर कहा था कि कोई भी सुरक्षा व्यवस्था उन्हें नहीं बचा पाएगी और वह जल्द ही बदला लेगा।

    इस खौफनाक साजिश के पीछे की मुख्य वजह पुरानी दुश्मनी और बदला लेना है। साल 2020 में एक अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान की खास सेना के बड़े कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत हो गई थी। उस समय डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति थे। पकड़ा गया आतंकी इसी मौत का बदला इवांका ट्रंप को मारकर लेना चाहता था।

    जानकारी के मुताबिक, आतंकी अल-सादी के पिता भी ईरानी सेना में एक अधिकारी थे। साल 2006 में पिता की मौत के बाद सुलेमानी ने ही उसका ध्यान रखा था और वह उसके लिए पिता की तरह था। सुलेमानी की मौत से अल-सादी बहुत गुस्से में था। वाशिंगटन में काम कर चुके एक पुराने अधिकारी ने बताया कि यह आतंकी अक्सर कहता था कि उसे इवांका को मारना है। वह ट्रंप के घर को उसी तरह जलाना चाहता था, जैसे अमेरिका ने उसका घर जलाया था।

    जांच में यह भी पता चला है कि इस आतंकी की जड़ें बहुत गहरी और खतरनाक हैं। बचपन में ही उसे इराक से ईरान भेज दिया गया था। वहां उसने ईरान की सबसे ताकतवर सेना से हथियारों और हमलों की कड़ी ट्रेनिंग ली थी। इसके अलावा, वह इराक के एक खतरनाक हथियारबंद समूह ‘कतैब हिजबुल्लाह’ का भी बहुत बड़ा सदस्य है। इस समूह को अमेरिका ने बहुत पहले ही एक आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है।

    सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि यह आतंकी सिर्फ इवांका ट्रंप के पीछे ही नहीं था। उस पर यूरोप और अमेरिका में 18 से ज्यादा दूसरे आतंकी हमलों की साजिश रचने का भी गंभीर आरोप है। इनमें नीदरलैंड के एक बैंक पर बम धमाका, लंदन में लोगों पर चाकू से हमला और बेल्जियम में एक धार्मिक स्थल को निशाना बनाने की साजिश शामिल है।

    इस तरह की बड़ी और हाई-प्रोफाइल आतंकी साजिश का सीधा असर आम लोगों के मन पर पड़ता है। जब देश के राष्ट्रपति के परिवार तक आतंकी पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं, तो आम नागरिक अपनी सुरक्षा को लेकर डर महसूस करने लगते हैं।

    इस बड़े खुलासे के बाद अमेरिका और यूरोप के कई बड़े शहरों में सुरक्षा काफी बढ़ा दी गई है। भीड़ वाले इलाकों, बाजारों और खास इमारतों के आस-पास पुलिस की गश्त और चेकिंग सख्त कर दी गई है। इससे आम लोगों को सफर करने और अपने रोजमर्रा के कामों में थोड़ी परेशानी उठानी पड़ सकती है। यह घटना आम जनता को याद दिलाती है कि आतंकवाद का साया अभी भी दुनिया से खत्म नहीं हुआ है।

    अब इस पकड़े गए आतंकी पर अमेरिका की अदालत में कड़ी कानूनी कार्रवाई चलेगी। जांच एजेंसियां अब गहराई से इस बात का पता लगा रही हैं कि इस पूरी साजिश में उसे पैसा और मदद कहां से मिल रही थी। यह भी जांच की जा रही है कि आतंकी को इवांका ट्रंप के घर का पूरा नक्शा कैसे और कहां से मिला।

    इस घटना के बाद इवांका ट्रंप और उनके परिवार की सुरक्षा में भारी इजाफा किया गया है। सुरक्षा एजेंसियां अब उनके घर और आस-पास के इलाकों की ज्यादा कड़ाई से निगरानी कर रही हैं। अमेरिका और ईरान के बीच पहले से ही रिश्ते काफी खराब हैं। इस नई साजिश के सामने आने के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव और ज्यादा बढ़ने की पूरी आशंका है।

    इवांका ट्रंप की हत्या की साजिश का समय रहते नाकाम होना अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक बड़ी और अहम जीत है। लेकिन यह घटना इस बात का भी साफ इशारा है कि आतंकवाद की जड़ें दुनिया भर में कितनी गहरी फैल चुकी हैं। पुराने दुश्मनी और बदले की भावना से रची गई ऐसी साजिशें पूरी दुनिया की शांति और सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं।

    अमेरिका को अब अपनी सुरक्षा नीतियों और खुफिया तंत्र को लेकर और ज्यादा सख्त होना पड़ेगा। ऐसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क को तोड़ने के लिए दुनिया भर के सभी देशों को एकजुट होकर काम करने की जरूरत है। जब तक आतंकवाद के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक आम नागरिकों के साथ-साथ बड़े नेताओं और उनके परिवारों को भी सुरक्षित रखना मुश्किल होगा।

  • ईरान-इस्राइल युद्ध: नाटो देशों पर भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, दी बड़ी चेतावनी

    ईरान-इस्राइल युद्ध: नाटो देशों पर भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, दी बड़ी चेतावनी

    ईरान और इस्राइल के बीच चल रहे इस भयंकर युद्ध के दौरान अमेरिका लगातार इस्राइल की मदद कर रहा है। लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो यानी उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (यह पश्चिमी देशों का एक बड़ा सैन्य गठबंधन है) के देशों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ट्रंप का मानना है कि इस पूरे संकट का आर्थिक और सैन्य बोझ अकेले अमेरिका को उठाना पड़ रहा है।

    पश्चिम एशिया में चल रहा ईरान-इस्राइल युद्ध अब एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। इस महायुद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सहयोगी नाटो देशों के रवैये पर गहरी नाराजगी जताई है। यह खबर दुनिया भर के देशों के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि इसका सीधा असर वैश्विक सुरक्षा और व्यापार पर पड़ने वाला है। अगर नाटो देशों के बीच यह आपसी विवाद बढ़ता है, तो इससे पूरी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई ठप हो सकती है और महंगाई आसमान छू सकती है।

    ईरान और इस्राइल के बीच चल रहे इस भयंकर युद्ध के दौरान अमेरिका लगातार इस्राइल की मदद कर रहा है। लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो यानी उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (यह पश्चिमी देशों का एक बड़ा सैन्य गठबंधन है) के देशों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ट्रंप का मानना है कि इस पूरे संकट का आर्थिक और सैन्य बोझ अकेले अमेरिका को उठाना पड़ रहा है।

    व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार राष्ट्रपति ट्रंप ने नाटो के सदस्य देशों को पर्दे के पीछे से एक बहुत ही कड़ा संदेश भेजा है। उन्होंने साफ कहा है कि अगर यूरोपीय देशों को वैश्विक सुरक्षा में अमेरिका का साथ चाहिए, तो उन्हें इस जंग के खर्च में अपनी हिस्सेदारी तुरंत बढ़ानी होगी। ट्रंप ने उन देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की चेतावनी भी दी है जो इस संकट में अमेरिका के साथ खड़े नहीं हो रहे हैं।

    इतना ही नहीं, अमेरिका की खुफिया रिपोर्टों में एक बड़ा खुलासा हुआ है। इस्राइल को ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों से बचाने के लिए अमेरिका ने अपनी बहुत सारी एयर-डिफेंस मिसाइलें (यह हवा में ही दुश्मन की मिसाइल को नष्ट करने वाली तकनीक है) दागी हैं। इसके कारण अमेरिका का अपना खुद का रक्षा भंडार अब लगभग आधा खाली हो चुका है। ट्रंप इस बात से बेहद नाराज हैं कि यूरोपीय देश इस भारी नुकसान की भरपाई के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।

    विवाद की मुख्य वजह यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप नाटो देशों के इस रवैये को लंबे समय से एकतरफा मानते आए हैं। ट्रंप का कहना है कि संकट के समय यूरोपीय देश सिर्फ मूकदर्शक बनकर तमाशा देखते हैं। वे युद्ध का पूरा वित्तीय बोझ अकेले अमेरिका के कंधों पर डाल देते हैं।

    दूसरी तरफ यूरोपीय देशों जैसे फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन का इस मामले में अपना अलग ही सोचना है। ये देश इस युद्ध में सीधे तौर पर कूदने से लगातार बच रहे हैं। यूरोपीय देशों को डर है कि अगर उन्होंने इस लड़ाई में अमेरिका का खुलकर साथ दिया, तो यह एक पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध में बदल जाएगा। ऐसा होने पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था तबाह हो सकती है।

    इसके अलावा यूरोपीय देश पहले से ही अपनी सीमाओं के पास चल रहे रूस और यूक्रेन के बीच के संघर्ष से परेशान हैं। इस पुराने युद्ध के कारण यूरोप के देशों पर पहले से ही बहुत ज्यादा आर्थिक और सैन्य दबाव बना हुआ है। इसलिए वे मध्य-पूर्व यानी मिडिल ईस्ट के इस नए मोर्चे पर अपने कीमती संसाधन और पैसा नहीं झोंकना चाहते हैं।

    अमेरिका और नाटो देशों के बीच सैन्य खर्चों को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल में भी कई बार नाटो देशों को चेता चुके थे कि वे अपनी सुरक्षा के लिए पूरा पैसा खुद खर्च करें। ट्रंप हमेशा से ‘अमेरिका फर्स्ट’ यानी अमेरिका को सबसे पहले रखने की नीति पर काम करते आए हैं।

    इस बार ईरान और इस्राइल के बीच बढ़ा तनाव इस पुराने विवाद को दोबारा सतह पर ले आया है। ईरान लगातार इस्राइल पर मिसाइलों से हमले कर रहा है और इस्राइल को बचाने के लिए अमेरिका को अरबों डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। अमेरिका के रक्षा गोदाम खाली हो रहे हैं, जिससे अमेरिकी प्रशासन के भीतर नाटो के प्रति गुस्सा और ज्यादा बढ़ गया है।

    ईरान-इस्राइल युद्ध का व्यापार और उद्योग पर असर

    इस कूटनीतिक तनाव और युद्ध का सबसे बड़ा और सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर देखने को मिल रहा है। ईरान और इस्राइल के बीच छिड़ी इस जंग के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी उछाल आ गया है। तेल की कीमतें लगातार बढ़ने से दुनिया भर के बाजारों में हड़कंप मचा हुआ है।

    कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर भारत जैसे विकासशील देशों के व्यापार और उद्योग पर पड़ेगा। जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। इससे फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान की कीमत बढ़ जाती है और बाजारों में हर चीज महंगी होने लगती है। उद्योगों के लिए कच्चे माल का आयात करना भी अब काफी महंगा साबित हो रहा है।

    अगर नाटो देशों और अमेरिका के बीच यह आपसी तालमेल इसी तरह बिगड़ा रहा, तो आने वाले दिनों में तेल की सप्लाई पूरी तरह ठप हो सकती है। इससे दुनिया भर के शेयर बाजारों में भारी गिरावट आ सकती है। निवेशक अपना पैसा सुरक्षित जगहों पर लगाने के लिए बाजारों से निकाल रहे हैं, जिससे औद्योगिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।

    आने वाले दिनों में यदि नाटो के सदस्य देश अमेरिका की मदद के लिए आगे नहीं आते हैं, तो यह संकट और गहरा हो जाएगा। ऐसी स्थिति में इस्राइल और अमेरिका दोनों के लिए ईरान के बड़े हवाई हमलों को रोक पाना बहुत मुश्किल हो सकता है। हथियारों की भारी कमी के कारण सैन्य संतुलन पूरी तरह से बिगड़ सकता है।

    अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ट्रंप की इस सख्त चेतावनी के बाद नाटो देश क्या कदम उठाते हैं। क्या फ्रांस और जर्मनी जैसे बड़े यूरोपीय देश अमेरिका को आर्थिक मदद देने के लिए राजी होंगे, या फिर वे अपने रुख पर अड़े रहेंगे। यदि यूरोपीय देश पीछे हटते हैं, तो ट्रंप अमेरिका की तरफ से उनके व्यापार पर कड़े प्रतिबंध लगा सकते हैं।

    ईरान और इस्राइल का यह भयंकर सैन्य संघर्ष केवल दो देशों की लड़ाई तक सीमित नहीं रह गया है। इसने पश्चिमी देशों के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो के अंदरूनी मतभेदों और दरारों को पूरी तरह से दुनिया के सामने लाकर रख दिया है। संकट के इस दौर में महाशक्तियों की यह आपसी फूट बेहद चिंताजनक है।

    इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की दिशा बदलने वाली है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक नेता इस संकट को बातचीत से सुलझा पाते हैं या दुनिया एक और बड़े आर्थिक संकट की तरफ बढ़ जाएगी। फिलहाल पूरी दुनिया के बाजारों और आम लोगों के लिए आने वाला समय बड़ी चुनौतियों से भरा दिखाई दे रहा है।